महंगाई अब राष्ट्रीय महत्व की चीज हो गई है। इतनी कि प्रधानमंत्री को दूरदर्शन पर आकर बताना पड़ा कि यह क्यों जरूरी है। अब तक सरकार इसे बहुत महत्व नहीं दे रही थी। कहते हैं कि उसकी वजह से चुनाव तक हार रही थी, फिर भी उसे कोई महत्व नहीं देना चाहती थी। इसीलिए उसकी ओर देख भी नहीं रही थी। आंखें चुरा रही थी। पहचानने तक से इनकार कर रही थी। लोगों ने बहुत हाय-तौबा मचायी तो भी उसने उसे हल्के-फुल्के ढंग से ही टालने की कोशिश की -यह तो ग्लोबल है यार। फ्री में मिल रही है। जो अमेरिका और यूरोप में मिल रही है, वही तुम्हें भी मिल रही है। न डुप्लीकेट है, न इंडिया में बनी है और सस्तेवाला चीनी माल तो बिल्कुल भी नहीं है। ऐसा मौका कब-कब मिलता है। लूट लो। मजे लो। सरकार ऐसे कह रही थी, जैसे अमेरिका-यूरोपवाला सुख फ्री में मिल रहा हो।
पर महंगाई कोई राम-नाम की लूट तो है नहीं कि लूट सको तो लूट लो। हालांकि लूट के नाम पर जनता तो सिर्फ वही लूट सकती है। बाकी कुछ लूटने का मौका नेता, अफसर, ठेकेदार, माफिया वगैरह उसे कहां देते हैं। सब तो खुद ही लूट ले जाते हैं। फिर महंगाई की लूट के बारे में तो यही कहा जाता है कि वह तो सेठ, सटोरिए और कालाबाजारिए ही मचाते हैं। वह शुद्ध उन्हीं के लिए होती है। सो महंगाई की मार से जनता बिलबिलाती रही। सरकार ने फिर समझाया -देखो यार, यह पूरी दुनिया में है। हमारे लिए कोई अनोखी थोड़े है। पर जनता के साथ जब विपक्ष और सहयोगी भी हाय-तौबा मचाने लगे और यह नहीं थमी तो सरकार का धैर्य जवाब दे गया। बोली- हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है।
पर अब महंगाई राष्ट्रीय महत्व की चीज हो गई है। वैसे ही जैसे स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस होते हैं। इसलिए स्वयं प्रधानमंत्री को दूरदर्शन पर आकर बताना पड़ा कि यह क्यूं जरूरी है। हालांकि वह दूरदर्शन पर उस तरह नहीं आए, जैसे स्वाधीनता दिवस वगैरह पर आया करते हैं रस्मी तौर पर। वह दूरदर्शन पर वैसे भी नहीं आए जैसे राष्ट्रीय आपदा के वक्त आया करते हैं। वह दूरदर्शन पर वैसे भी नहीं आए जैसे बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद नरसिंह राव आए थे और उन्होंने मस्जिद दोबारा बनाने का वादा किया था। वह दूरदर्शन पर वैसे भी नहीं आए, जैसे इंदिराजी रेडियो पर आई थी, इमरजेंसी की घोषणा की थी और बताया था कि वह क्यों जरूरी है।
प्रधानमंत्री तो दूरदर्शन पर यह बताने आए कि महंगाई क्यों जरूरी है। इससे पता चलता है कि महंगाई राष्ट्रीय महत्व की चीज हो गई है। यह महंगाई की जीत है कि कल तक जो सरकार उसको कोई महत्व नहीं देती थी, उसी सरकार के प्रधानमंत्री को उसने दूरदर्शन पर आकर यह बताने को मजबूर कर दिया कि वह क्यों जरूरी है। अब तक महंगाई बाजार से आती थी, जनता हाय-तौबा मचाती थी, दुकानदार भी रोना रोते थे, लेकिन उसका महत्व क्या था। वैसे भी आलू-प्याज और आटे-दाल से महत्व नहीं बनता, सिर्फ हाय-तौबा मचती है। जब तक शासकों से रिकगनिशन न मिले तब तक मजा नहीं आता। उसने तो अमेरिका-यूरोप से आकर भी देख लिया। फिर भी शासकों ने उसे कोई महत्व नहीं दिया। इसलिए वह खूब फली बढ़ी और सरकार को मजबूर किया कि वह उसके महत्व को स्वीकार करे। इसीलिए अब वह वाया दूरदर्शन आई है।
दूरदर्शन पर आकर प्रधानमंत्री ने बताया कि महंगाई भावी पीढ़ियों के लिए जरूरी है। उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए जरूरी है। उनकी सुख-समृद्धि के लिए जरूरी है। अभी तक यही माना जाता था कि भावी पीढ़ियों के लिए अच्छी शिक्षा जरूरी है। अच्छा स्वास्थ्य जरूरी है। सड़क-बिजली-पानी वाला विकास का बुनियादी ढांचा जरूरी है। रोजगार की बेहतर सुविधाएं जरूरी हैं। अच्छी कृषि और अच्छा उद्योग जरूरी है। जरूरी है कि भूख-बीमारी और बदहाली खत्म हो। जरूरी है कि मेहनत का फल मिले। पर प्रधानमंत्री ने कहा कि भावी पीढि़यों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और उनकी सुख-समृद्धि के लिए महंगाई जरूरी है।
Saturday, June 28, 2008
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